Saturday, 25 July 2015



उस गली का वह पुराना घर, 
जहॉ बचपन बीति,
जहाँ ना कोई रिवाज़ थी,
ना कोई रीति,
जहा चलती थी केवल
अपनी ही नीति,
वह गली छोड़ अब मै
एक मोहल्ले पर खड़ा हूँ ..
अपनी ही बातो को लेकर
कितनो से लड़ा हूँ
कहते हैं आगे फिर,
कोई बड़ा शहर आएगा ,
अपने साथ ढेर सारी,
चुनौतियाँ लाएगा..
पर भरोसा है मुझे खुद पर,
मै अपनी बात कहूँगा,
अब तक लड़ता आया हूँ
लड़ता रहूँगा...लड़ता रहूँगा....
सुना हे,की आज कल मेरे घर पे चप्पलो का ढेर काफी है 
चलो पता तो चला, की मेरी कविताओ का ख़ौफ़ बाकि है 
और जब जब गलियों से निकलू मै 
सन्नाटा छा जाता हे ,कोई नजर नहीं आता है 
कुत्ते भी दुबक जाते हे, पत्ते खुद से लिपट जाते हे, 
हवाए रुख बदल लेती हे, घटाए सूरज को ढ़क लेती हे,
घड़ियां भी सुन हो जाती हे , चिड़िया पतंग हो जाती हे
मंजर भूतिया हो जाता हे,
और भूत भी डर कर हनुमान चालीसा गाता हे,
और शायद उन्हें डर इस बात का हे
की कही उनकी आवाज़ों को अपनी वाह वाही ना कह दू,
उन्हें अपनी अगली कविता का शिकार न कर दू


आज कलम उठी है, लिखने दो, 
बड़े जुल्म सहे हैं, अब उठने दो 
बड़ी मुश्किल से आज़ाद हुए हैं, 
मेरी माँ ये मुझसे कहती है, 
मैं कैसे जानूं की हम आज़ाद हुए है, 
मेरी रूह ये मुझसे कहती है |
मैने पूछा -
माँ तुमने कैसे जाना भारतवासी आज़ाद हुए
इतना बड़ा है भारत मेरा, कैसे सब एकसाथ हुए
माँ कहती है -
बेटा अख़बार है कहता कि हम भारतवासी आज़ाद हुए
काम वही है मेरा तेरा बस कुछ गोरों से कुछ काले आज़ाद हुए मेरी तेरी क्या हस्ती है, संसार वही मेरी बस्ती है
अब सो जाते हैं लल्ला मेरे, फिर रोज़ वही एक किश्ती है
आज कलम उठी है, लिखने दो,
बड़े जुल्म सहे हैं, अब उठने दो
कभी हैं डरते कभी सिसकते, यार जियो और जीने दो
हिंदू मुस्लिम के दंगे छोड़ बोलो, नेताओं मुझसे मेरा भारत दो
सालों पहले तुमने मुझसे, मेरा ही भारत माँगा था
भारत विकसित कर दोगे जल्दी, क्या ये खोखा वादा था
सालों बाद मुझे भारत दे दो, तुमसे ये ना हो पाएगा
जाग गया अब भारतवासी, अब आम आदमी आएगा
बैंक समझ रख दिया वतन को अपना, क्या पता
भ्रष्टाचारी और बेरोज़गारी जैसे इंटरेस्ट साथ ले आएगा
आज कलम उठी है, लिखने दो,
बड़े जुल्म सहे हैं, अब उठने दो
कुछ कर दिखाने का जूनून रख या कुछ ना कर पाने का मलाल कर सब कुछ तेरे हाथ मे है 
ज़्यादा सोचने का समय नही ज़िन्दगी बोहोत रफ़्तार मे है.. 
मन्ज़िल का पता कर रास्ता भी निक्लेगा.. अभी तो तु कतार मे है.. 
ये मत सोच क तु न हारा तो मन्ज़िल को जल्दी देख पायेगा.. 
अर्रे वो मजा मन्ज़िल मे कहाँ जो उसके रास्ते मे है.. 

डर को खुद से दूर रख ये तुजे भटकायेगा...
तु कदम तेज़ कर ले..डर पिछे छूट जायेगा..
हाँ बोहोत दर्द होंगे तु दिल मे सम्भाले हुए..
इतना मजबूत बन क एक हँसी ही काफ़ी हो ..वो दर्द भुलाने के लिये
रोकने वालो की कमी नही पूरा ज़माना खडआ हो जायेगा..ऐसे मे बस एक ही हाथ तुजे बचाएगा वो होग तेरा खुद का.. जो तुजे खुद पर विश्वास दिलाएगा ..
अगर मन्ज़िल मिली तो सुकून मिलेगा और अभिमान बढ जायेगा..
और अगर नही मिली तो तु पेहले से भी अच्छा इन्सान बन जायेगा

Friday, 9 January 2015


Thank you, friends, for all the things
That mean so much to me--
For concern and understanding
You give abundantly.
Thanks for listening with your heart;
For cheering me when I'm blue;
For bringing out the best in me;
And just for being you.
Thanks for in-depth conversation
That stimulates my brain;
For silly times we laugh out loud;
For things I can't explain.
For looking past my flaws and faults;
For all the time you spend;
For all the kind things that you do
हर राह को मै चाहू, हर मंजिल मुझको भाती है
मेरी कोई दिशा नहीं, सिर्फ हवा मुझे बहलाती है
प्रवाह जिधर भी तेज हुआ ,ते उधर निकल लेता हु मै
मांग जिधर भी तेज हुई, ते उधर खिसक लेता हु मै 
मेरी आँखों के सपने हर पल पल पल पल बदले है
मेरे खवाबो के परिंदे ,आसमान में भटके हे
जाने की कोई राह नहीं ,बस आस लगाए बैठे हे
मन की बत्ती को बजाए ,जुगनू पे तो तरसे हे


बेबस हूँ,बेबाक हूँ,बेशर्म हूँ,बिंदास हूँ,कमजोर भी हूँ 
लेकिन बस बलवान नही! 
कभी इस घर की,कभी उस घर की,कभी इस पल की,कभी उस पल की 
मेरी अपनी कोई पहचान नही! 
जिसने चाहा वहा मोड़ दिया,रूह को मेरी झकझोर दिया,अंदर तक मुझको तोड़ दिया 
मेरी इज़्ज़त थी,कोई काँच नही!
मेरे सपने,मेरे विचार,मेरी उड़ान,मेरे लिए सिर्फ़ धरती है यहाँ,मेरा कोई आसमान नही!
मेरे लिए एक लीबाज़,एक चौखट,एक वक़्त ओर फ़र्ज़ हैं
इस शब्द आज़ादी पर मेरा कोई अधिकार नही!