Saturday, 25 July 2015

वो बार-बार मन को मेरे, छलनी किये जाते हैं,
हम मुस्कुरा-मुस्कुरा के,बस होंठ सिये जाते हैं.
हर राह, हर कदम उन्होंने, साथ छोड़ा है मेरा,
हम मित्रों की फेहरिस्त में,उनका नाम लिए जाते हैं.
झूठ का दामन उन्होंने,थामे रखा है जकड़ कर,
फिर भी हम वफाओं की,उम्मीद किये जाते हैं.
हर बार सोचते है पलट वारकरें हम भी आज,
वो दुहाई दे दोस्ती की,हमे चुप किए जाते हैं.
वो बार-बार मन को मेरे,छलनी किये जाते हैं,
हम मुस्कुरा-मुस्कुरा के,बस होंठ सिये जाते हैं.

मिलने को बेकरार हैं , मिलकर तो देखिये । 
दो - चार कदम साथ में , चलकर तो देखिये।
आना पराये काम में देता है क्या सकूँ ,
कभी दूसरे की आग में , जलकर तो देखिये।
मिल जुल के साथ जीने में है और ही मज़ा,
इन तंग दायरों से, निकलकर तो देखिये।
रखे कोई सहेजकर , भगवान पर चढ़ो,
बनकर के फूल काँटों में , खिलकर तो देखिये।
मजबूरीयों में किस तरह कटती है ज़िंदगी,
घर में किसी गरीब के, पलकर तो देखिये।
दंगा - फसाद , झूठ से , नफरत करोगे तुम,
साँचे में कभी 'सत्य' के ढलकर तो देखिये।

देखना एक दिन तुझे भी हमसे मुहब्बत हो जाएगी.!
रात-रात भर जागेगी और ख़यालो में खो जाएगी.!!
यूँ ही शाम ढलेगी और यूँ ही दिन भी निकलेगा.!
आईना में देख सूरत अपनी खुद से शरमाएगी.!!
कई हैं ज़माना में हसीन हम तो कुछ भी नहीं हैं.!
बनाना चाहेगी हमसफर कोई सूरत मेरी नज़र आएगी.!!
गुज़रेगी मेरी गली से देखेगी जब मेरे उजड़े घर को.!
याद कर-कर हमें तन्हाई में खूब अश्क़ बहाएगी.!!
वक़्त की ठोकरें अच्छे-अच्छों को जीना सीखा देती.!
ना रहेंगे जब हम तो शायेद खुदको संभाल पाएगी!


उस गली का वह पुराना घर, 
जहॉ बचपन बीति,
जहाँ ना कोई रिवाज़ थी,
ना कोई रीति,
जहा चलती थी केवल
अपनी ही नीति,
वह गली छोड़ अब मै
एक मोहल्ले पर खड़ा हूँ ..
अपनी ही बातो को लेकर
कितनो से लड़ा हूँ
कहते हैं आगे फिर,
कोई बड़ा शहर आएगा ,
अपने साथ ढेर सारी,
चुनौतियाँ लाएगा..
पर भरोसा है मुझे खुद पर,
मै अपनी बात कहूँगा,
अब तक लड़ता आया हूँ
लड़ता रहूँगा...लड़ता रहूँगा....
सुना हे,की आज कल मेरे घर पे चप्पलो का ढेर काफी है 
चलो पता तो चला, की मेरी कविताओ का ख़ौफ़ बाकि है 
और जब जब गलियों से निकलू मै 
सन्नाटा छा जाता हे ,कोई नजर नहीं आता है 
कुत्ते भी दुबक जाते हे, पत्ते खुद से लिपट जाते हे, 
हवाए रुख बदल लेती हे, घटाए सूरज को ढ़क लेती हे,
घड़ियां भी सुन हो जाती हे , चिड़िया पतंग हो जाती हे
मंजर भूतिया हो जाता हे,
और भूत भी डर कर हनुमान चालीसा गाता हे,
और शायद उन्हें डर इस बात का हे
की कही उनकी आवाज़ों को अपनी वाह वाही ना कह दू,
उन्हें अपनी अगली कविता का शिकार न कर दू


आज कलम उठी है, लिखने दो, 
बड़े जुल्म सहे हैं, अब उठने दो 
बड़ी मुश्किल से आज़ाद हुए हैं, 
मेरी माँ ये मुझसे कहती है, 
मैं कैसे जानूं की हम आज़ाद हुए है, 
मेरी रूह ये मुझसे कहती है |
मैने पूछा -
माँ तुमने कैसे जाना भारतवासी आज़ाद हुए
इतना बड़ा है भारत मेरा, कैसे सब एकसाथ हुए
माँ कहती है -
बेटा अख़बार है कहता कि हम भारतवासी आज़ाद हुए
काम वही है मेरा तेरा बस कुछ गोरों से कुछ काले आज़ाद हुए मेरी तेरी क्या हस्ती है, संसार वही मेरी बस्ती है
अब सो जाते हैं लल्ला मेरे, फिर रोज़ वही एक किश्ती है
आज कलम उठी है, लिखने दो,
बड़े जुल्म सहे हैं, अब उठने दो
कभी हैं डरते कभी सिसकते, यार जियो और जीने दो
हिंदू मुस्लिम के दंगे छोड़ बोलो, नेताओं मुझसे मेरा भारत दो
सालों पहले तुमने मुझसे, मेरा ही भारत माँगा था
भारत विकसित कर दोगे जल्दी, क्या ये खोखा वादा था
सालों बाद मुझे भारत दे दो, तुमसे ये ना हो पाएगा
जाग गया अब भारतवासी, अब आम आदमी आएगा
बैंक समझ रख दिया वतन को अपना, क्या पता
भ्रष्टाचारी और बेरोज़गारी जैसे इंटरेस्ट साथ ले आएगा
आज कलम उठी है, लिखने दो,
बड़े जुल्म सहे हैं, अब उठने दो
कुछ कर दिखाने का जूनून रख या कुछ ना कर पाने का मलाल कर सब कुछ तेरे हाथ मे है 
ज़्यादा सोचने का समय नही ज़िन्दगी बोहोत रफ़्तार मे है.. 
मन्ज़िल का पता कर रास्ता भी निक्लेगा.. अभी तो तु कतार मे है.. 
ये मत सोच क तु न हारा तो मन्ज़िल को जल्दी देख पायेगा.. 
अर्रे वो मजा मन्ज़िल मे कहाँ जो उसके रास्ते मे है.. 

डर को खुद से दूर रख ये तुजे भटकायेगा...
तु कदम तेज़ कर ले..डर पिछे छूट जायेगा..
हाँ बोहोत दर्द होंगे तु दिल मे सम्भाले हुए..
इतना मजबूत बन क एक हँसी ही काफ़ी हो ..वो दर्द भुलाने के लिये
रोकने वालो की कमी नही पूरा ज़माना खडआ हो जायेगा..ऐसे मे बस एक ही हाथ तुजे बचाएगा वो होग तेरा खुद का.. जो तुजे खुद पर विश्वास दिलाएगा ..
अगर मन्ज़िल मिली तो सुकून मिलेगा और अभिमान बढ जायेगा..
और अगर नही मिली तो तु पेहले से भी अच्छा इन्सान बन जायेगा