जीओ और जीने दो, ये दो शब्द हैं किन्तु यदि देखें तो इन दो शब्दों में जिन्दगी का सार छिपा है .इन्सान, इन्सान के रूप में जन्म तो लेता है किन्तु उसके कर्म इन्सानों जैसे नहीं होते कई दफा तो वो अपने स्वार्थ खातिर इन्सानों का खून बहाने से भी नहीं चूकता .उसके कर्म जानवरों जैसे हो जाते हैं .कई बार तो इतना कूर और ज़ालिम हो जाता है कि जानवरों को भी मात दे जाता है .अपने स्वार्थवश वो अपनों का भी खून बहा देता है यदि हम यह दो शब्द, जीओ और जीने दो , अपना लें तो यह धरती स्वर्ग हो जाएगी . इन दो शब्दों का तात्पर्य है कि खुद भी जीयें औरों को भी शान्ति से उनको उनकी जिन्दगी जीने दें . क्यूँ हम लोग आज इतने स्वार्थी हो गए है कि धर्म , जाती , प्यार के नाम पे इंसानियत का खून बहा रहे हैं प्यार करने वालों को अपनी इज्ज़त कि खातिर मार देते हैं जिसे' hounor killing' का नाम दिया जाता है कभी धर्म कि खातिर लोगों को मारा जाता है कौन सा धर्म है ,कौन सा कोई धार्मिक ग्रन्थ है या कौन से कोई देवी देवता ,गुरु , साधू , संत पीर पैगंम्बर हुए हों जिन्होंने कहा हो या कहीं लिखा हो कि धर्म के नाम पे लोगों कि हत्याएं करो. या कहीं लिखा हो कि प्यार करना गुनाह है और प्यार करने वालों की बलि देदो 'hounor killing ' के नाम पे . हम क्यूँ आज इतने कूर हो गए हैं जो ऐसे घिनोने कार्य करते हैं शान्ति से क्यूँ नहीं रहते . क्या मिलता है हमें ऐसे घिनोने कार्य करके शान्ति से खुद भी रहें औरों को भी रहने दें , आज आवश्कता है इन दो शब्दों को अपनाने क़ी ' जीओ और जीने दो
Saturday, 25 July 2015
जीओ और जीने दो, ये दो शब्द हैं किन्तु यदि देखें तो इन दो शब्दों में जिन्दगी का सार छिपा है .इन्सान, इन्सान के रूप में जन्म तो लेता है किन्तु उसके कर्म इन्सानों जैसे नहीं होते कई दफा तो वो अपने स्वार्थ खातिर इन्सानों का खून बहाने से भी नहीं चूकता .उसके कर्म जानवरों जैसे हो जाते हैं .कई बार तो इतना कूर और ज़ालिम हो जाता है कि जानवरों को भी मात दे जाता है .अपने स्वार्थवश वो अपनों का भी खून बहा देता है यदि हम यह दो शब्द, जीओ और जीने दो , अपना लें तो यह धरती स्वर्ग हो जाएगी . इन दो शब्दों का तात्पर्य है कि खुद भी जीयें औरों को भी शान्ति से उनको उनकी जिन्दगी जीने दें . क्यूँ हम लोग आज इतने स्वार्थी हो गए है कि धर्म , जाती , प्यार के नाम पे इंसानियत का खून बहा रहे हैं प्यार करने वालों को अपनी इज्ज़त कि खातिर मार देते हैं जिसे' hounor killing' का नाम दिया जाता है कभी धर्म कि खातिर लोगों को मारा जाता है कौन सा धर्म है ,कौन सा कोई धार्मिक ग्रन्थ है या कौन से कोई देवी देवता ,गुरु , साधू , संत पीर पैगंम्बर हुए हों जिन्होंने कहा हो या कहीं लिखा हो कि धर्म के नाम पे लोगों कि हत्याएं करो. या कहीं लिखा हो कि प्यार करना गुनाह है और प्यार करने वालों की बलि देदो 'hounor killing ' के नाम पे . हम क्यूँ आज इतने कूर हो गए हैं जो ऐसे घिनोने कार्य करते हैं शान्ति से क्यूँ नहीं रहते . क्या मिलता है हमें ऐसे घिनोने कार्य करके शान्ति से खुद भी रहें औरों को भी रहने दें , आज आवश्कता है इन दो शब्दों को अपनाने क़ी ' जीओ और जीने दो
पिछले कुछ समय में हमने इस समाज के दो चेहरे देखे | एक अत्यंत घिनोना, डरावना, अपराध, आतंक और दहशतगर्दी का | इसी समाज में छुपे वो चेहरे इतने घिनोने थे कि उन्हें इंसान मानना इस समाज के लिए सहज ना था | फिर चाहे वो गोवाहाटी की घटना हो या दामिनी की | चाहे वो आंतकवाद हो या नक्सलवाद | चाहे वो अपराध हो, दुष्कर्म हो या फिर व्यर्थ की बयानबाज़ी | इस तरह की घटनाएँ जब भी होती है, जहाँ कहीं होती है, इंसानियत के चीथड़े-चीथड़े कर देती है और मानवता को तार तार कर देती है |
ये लहू इंसानों का है या इसका रंग कुछ और है
आदमी के भेष में ये कौन आदमखोर है........ !
आदमी के भेष में ये कौन आदमखोर है........ !
ये चेहरा था क्रिया का | और एक चेहरा था प्रतिक्रिया का | इन सब घटनाओं के अंजाम बेहद दर्दनाक थे, मगर इसके दुसरे पहलू पर गौर किया जाये तो जिस तरह की क्रिया हुई उतनी जबरजस्त प्रतिक्रिया भी हुई | जिस तरह अपार जन सैलाब इन घटनाओं के विरोध में सड़कों पर उतरा वो एक बहुत बड़े परिवर्तन की तरफ इशारा कर गया | अपराधों को चुपचाप सहन करने वाले और डर के साये में जीने वाले समाज का हमने एक नया चेहरा देखा | एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हुआ "आखिर क्यूँ और आखिर कब तक?" अपने मुल्क को सरकारों के भरोसे छोड़ कर अपनी निजी जिंदगी में मस्त जनता की चेतना जाग्रत हुई और हमारे सब्र का बांध टूटा | नतीजे चाहे ज्यादा हमारे हक़ में ना रहे हो मगर इन विषयों पर चर्चा चौराहों तक पहुँची और हमने जवाब माँगना शुरू किया, ये अहम बात है |
विवाह या शादी हर इंसान का ख्वाब या सपना होती है और 24-25 साल के होते ही कच्चा माल "प्रोसेस्ड" होकर बाजार में बिकने आ जाता है! जितनी अच्छी नौकरी, उतने ही अच्छे दाम!!! आजकल जितना फायदा सिडबी (स्माल इंडस्ट्रीज़ डेवेलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया) द्वारा स्थापित किये गए लघु उद्योगों में नहीं होता है उतना तो आजकल विवाह बाजार में संतानों के व्यापार में हो जाता है! मुझे तो लगता है सरकार को विवाह का व्यवसायीकरण कर देना चाहिए और इसमें भी विदेशी कंपनियों को अपना हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित करना चाहिए! मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि भारतीय जीवन में विद्यमान जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी सोलह संस्कारों से जुडी हर चीज़ों को बेचने के सार्वभौमिक अधिकार सरकार को वालमार्ट जैसी कंपनियों को दे देने चाहिए और साथ साथ स्विस बैंकों को भी खुश करना चाहिए!
ज़िन्दगी कभी-कभी कुछ पुराने पन्ने दुहराती है
वो लम्हा जो शायद हुआ ही नहीं
उन्हें दुहराया हुआ दिखाती है
कुछ पुरानी खुशबुएँ हवा में फिर से आ जाती हैं
जिन्दगी कभी-कभी......
बदलने लगता हैं अहसास हवा के रुख़ के साथ
जो शायद पहले कभी े हुआ करता था
आने लगते हैं कुछ चेहरे आँखों के सामने यूँ ही
बिन जिनके जीवन कभी अधूरा लगा करता था
जिन्दगी हर रोज एक कुरु क्षेत्र बन ही जाती है
जिन्दगी कभी कभी.....
वो लम्हा जो शायद हुआ ही नहीं
उन्हें दुहराया हुआ दिखाती है
कुछ पुरानी खुशबुएँ हवा में फिर से आ जाती हैं
जिन्दगी कभी-कभी......
बदलने लगता हैं अहसास हवा के रुख़ के साथ
जो शायद पहले कभी े हुआ करता था
आने लगते हैं कुछ चेहरे आँखों के सामने यूँ ही
बिन जिनके जीवन कभी अधूरा लगा करता था
जिन्दगी हर रोज एक कुरु क्षेत्र बन ही जाती है
जिन्दगी कभी कभी.....
वो बार-बार मन को मेरे, छलनी किये जाते हैं,
हम मुस्कुरा-मुस्कुरा के,बस होंठ सिये जाते हैं.
हर राह, हर कदम उन्होंने, साथ छोड़ा है मेरा,
हम मित्रों की फेहरिस्त में,उनका नाम लिए जाते हैं.
हम मित्रों की फेहरिस्त में,उनका नाम लिए जाते हैं.
झूठ का दामन उन्होंने,थामे रखा है जकड़ कर,
फिर भी हम वफाओं की,उम्मीद किये जाते हैं.
फिर भी हम वफाओं की,उम्मीद किये जाते हैं.
हर बार सोचते है पलट वारकरें हम भी आज,
वो दुहाई दे दोस्ती की,हमे चुप किए जाते हैं.
वो दुहाई दे दोस्ती की,हमे चुप किए जाते हैं.
वो बार-बार मन को मेरे,छलनी किये जाते हैं,
हम मुस्कुरा-मुस्कुरा के,बस होंठ सिये जाते हैं.
हम मुस्कुरा-मुस्कुरा के,बस होंठ सिये जाते हैं.

मिलने को बेकरार हैं , मिलकर तो देखिये ।
दो - चार कदम साथ में , चलकर तो देखिये।
आना पराये काम में देता है क्या सकूँ ,
कभी दूसरे की आग में , जलकर तो देखिये।
कभी दूसरे की आग में , जलकर तो देखिये।
मिल जुल के साथ जीने में है और ही मज़ा,
इन तंग दायरों से, निकलकर तो देखिये।
इन तंग दायरों से, निकलकर तो देखिये।
रखे कोई सहेजकर , भगवान पर चढ़ो,
बनकर के फूल काँटों में , खिलकर तो देखिये।
बनकर के फूल काँटों में , खिलकर तो देखिये।
मजबूरीयों में किस तरह कटती है ज़िंदगी,
घर में किसी गरीब के, पलकर तो देखिये।
घर में किसी गरीब के, पलकर तो देखिये।
दंगा - फसाद , झूठ से , नफरत करोगे तुम,
साँचे में कभी 'सत्य' के ढलकर तो देखिये।
साँचे में कभी 'सत्य' के ढलकर तो देखिये।
देखना एक दिन तुझे भी हमसे मुहब्बत हो जाएगी.!
रात-रात भर जागेगी और ख़यालो में खो जाएगी.!!
यूँ ही शाम ढलेगी और यूँ ही दिन भी निकलेगा.!
आईना में देख सूरत अपनी खुद से शरमाएगी.!!
कई हैं ज़माना में हसीन हम तो कुछ भी नहीं हैं.!
बनाना चाहेगी हमसफर कोई सूरत मेरी नज़र आएगी.!!
गुज़रेगी मेरी गली से देखेगी जब मेरे उजड़े घर को.!
याद कर-कर हमें तन्हाई में खूब अश्क़ बहाएगी.!!
वक़्त की ठोकरें अच्छे-अच्छों को जीना सीखा देती.!
ना रहेंगे जब हम तो शायेद खुदको संभाल पाएगी!
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